माना गाँव – अंतिम नहीं, अब भारत का पहला गाँव!
उत्तराखंड का हर कोना अपनी अनोखी संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आस्था के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं जगहों में से एक है माना गाँव, जिसे भारत का “पहला गाँव” कहा जाता है। यह गाँव उत्तराखंड के चमोली ज़िले में स्थित है और तिब्बत (चीन) की सीमा से लगा हुआ है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले, दोनों देशों के बीच व्यापार इसी मार्ग से किया जाता था। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस गाँव का पुराना नाम “मणिभद्रपुरम” था।
कैसे पहुंचे-

- सड़क मार्ग- दिल्ली से ऋषिकेश पहुँचें, लगभग 240 किलोमीटर दूर स्थित हैं। जहाँ आप कार, बस से जा सकते हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिए टैक्सी या बस ले सकते हैं। की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है और सड़क मार्ग से पहुँचने में लगभग 10 से 12 घंटे लगते हैं । बद्रीनाथ से माणा गाँव मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहाँ आप स्थानीय टैक्सी या साझा वाहन से आसानी से पहुँच सकते हैं।
- रेल मार्ग- निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, ऋषिकेश से आप टैक्सी या बस लेकर माणा पहुँच सकते हैं।
- हवाई मार्ग- निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है, हवाई अड्डे से आप टैक्सी या बस लेकर माना पहुँच सकते हैं।
घूमने का सही समय
- मई से अक्टूबर- यह समय माना गांव घूमने के लिए सबसे अच्छा है। इस समय मौसम सुहावना रहता है|
- नवंबर से अप्रैल- इस समय में भारी बर्फबारी के कारण सड़कें बंद हो जाती हैं और यात्रा करना बहुत मुश्किल होता है।
माणा गाँव – भारत के अंतिम गाँव से पहला गाँव बनने की कहानी

अक्टूबर 2022 में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी माणा गाँव के दौरे पर पहुँचे थे। अपने दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि “माणा को भारत का अंतिम नहीं, बल्कि पहला गाँव कहा जाना चाहिए” — क्योंकि यहीं से देश की सीमा शुरू होती है।
प्रधानमंत्री की इस प्रेरणादायक सोच को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी और बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) ने आधिकारिक रूप से माणा गाँव को ‘भारत का पहला गाँव’ घोषित कर दिया।
धार्मिक महत्व-
गणेश गुफा-

माना गाँव में स्थित गणेश गुफा एक पवित्र और ऐतिहासिक स्थल है। मान्यता है कि यहीं पर भगवान गणेश ने व्यास ऋषि के निर्देश पर महाभारत की रचना लिखी थी। यह गुफा पत्थरों से बनी है और अंदर का वातावरण शांत और आध्यात्मिक अनुभूति से भरा होता है। गुफा के प्रवेश द्वार से हिमालय के बर्फ से ढके शिखरों का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है।
व्यास गुफा-

गणेश गुफा से कुछ ही दूरी पर स्थित है व्यास गुफा। मान्यता है कि महर्षि व्यास ने इसी गुफा में बैठकर महाभारत का पाठ किया था, जिसे भगवान गणेश ने गणेश गुफा में बैठकर लिखा था। यह गुफा पत्थरों से निर्मित है और इसकी संरचना प्राकृतिक रूप से गुम्बद के आकार की प्रतीत होती है, जो इसे और भी रहस्यमय बनाती है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि आज भी गुफा की दीवारों पर हल्की-सी ध्वनि सुनाई देती है, मानो व्यास ऋषि अब भी वेदों का पाठ कर रहे हों।
सरस्वती नदी-
माणा गाँव की सबसे अद्भुत और रहस्यमय जगहों में से एक है सरस्वती नदी। यह नदी व्यास गुफा के पास एक संकरे चट्टानी मार्ग से प्रकट होती है और कुछ ही दूरी पर जाकर पृथ्वी के अंदर लुप्त हो जाती है। इसी कारण इसे अदृश्य सरस्वती कहा जाता है।
भीम पुल-

मान्यता है कि जब पांडव स्वर्ग की ओर जा रहे थे, तो उन्हें सरस्वती नदी पार करनी थी। नदी का बहाव बहुत तेज था, इसलिए भीम ने अपनी अपार शक्ति से एक विशाल पत्थर उठाकर नदी पर रख दिया ताकि उनके भाई और द्रौपदी सुरक्षित रूप से पार जा सकें। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि प्रकृति की सुंदरता से भी भरा हुआ है — एक ओर बहती गरजती सरस्वती नदी, दूसरी ओर बर्फ से ढके हिमालयी पर्वत, और बीच में यह अद्भुत पत्थर का पुल।
अगर आप बद्रीनाथ की यात्रा पर जा रहे हैं, तो माणा गाँव की यात्रा जरूर करें। यह स्थान न केवल धार्मिक महत्त्व रखता है, बल्कि यहाँ आप प्रकृति की सुंदरता को बहुत करीब से महसूस कर सकते हैं। यहाँ की भोटिया जनजाति के लोग अपनी सादगी, मेहनत और अतिथि-सत्कार के लिए जाने जाते हैं। उनकी जीवनशैली सरल है और उनका खान-पान उतना ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है।












